नई दिल्ली/कोलकाता: जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव 2026 की तारीखें नजदीक आ रही हैं, चुनावी रणभूमि में 'वोटर लिस्ट' सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरी है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जाने के बाद टीएमसी, डीएमके और वाम दलों ने मोर्चा खोल दिया है। तीखी बयानबाजी के साथ आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर इस बात का पुख्ता संकेत है कि चुनावी संग्राम पूरी तरह छिड़ चुका है और सर्वाधिक बयानबाजी पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रही है।

राज्यों का गणित और कहाँ कितने नाम कटे?

विभिन्न राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया के बाद जो आंकड़े सामने आए हैं उन्होंने राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है। तमिलनाडु में सर्वाधिक 74 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं जिसे लेकर मुख्यमंत्री एमके स्टालिन केंद्र पर हमलावर हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता वाले इस राज्य में 63,66,952 मतदाताओं के नाम कटे हैं और टीएमसी इसे 'बीजेपी के इशारे पर की गई कार्रवाई' बता रही है। इसी तरह केरलम में करीब 9 लाख और असम में लगभग 2.43 लाख मतदाताओं के नाम पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत काटे गए हैं जो चुनावी राज्यों में सियासी उबाल का मुख्य कारण बना हुआ है।

विपक्ष का नैरेटिव और जमीनी हकीकत

ममता बनर्जी से लेकर एमके स्टालिन तक सभी क्षेत्रीय क्षत्रप इस मुद्दे को सड़क से सदन तक उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और इसके जरिए विपक्षी दलों के मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है। विपक्षी दल इस मुद्दे के जरिए जनता के बीच एक ऐसा नैरेटिव सेट करना चाहते हैं जिससे उन्हें चुनाव में सहानुभूति का लाभ मिल सके। हालांकि 2026 का चुनाव केवल एसआईआर तक सीमित नहीं है क्योंकि महंगाई, रोजगार और कानून-व्यवस्था जैसे बुनियादी मुद्दे भी मतदाताओं के फैसले को गहराई से प्रभावित करेंगे।

क्या होगा चुनावी असर और भविष्य की तस्वीर?

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि एसआईआर पर छिड़े संग्राम का लाभ डीएमके, टीएमसी या वाम दलों को होगा क्योंकि चुनाव परिणामों का पुख्ता जवाब भविष्य के गर्भ में है। निर्वाचन आयोग का तर्क है कि यह एक नियमित प्रक्रिया है ताकि फर्जी और दोहरे वोटर्स को हटाया जा सके लेकिन जिस पैमाने पर नाम कटे हैं उसने निश्चित रूप से उन लाखों परिवारों को प्रभावित किया है जिनका नाम अब लिस्ट में नहीं है। विपक्षी दलों की आक्रामकता का लाभ उन्हें तब मिल सकता है जब वे इसे नागरिक अधिकारों के हनन के रूप में पेश करने में सफल हों। फिलहाल सभी की नजरें 4 मई 2026 के नतीजों पर टिकी हैं जो इस सियासी उबाल का अंतिम फैसला करेंगे।